शिष्य जेड के संदूक को निहारता रहा और उन शब्दों को मन में उतारता रहा।
“क्या हमारे बीच समझौता हुआ?” गुरु ने पूछा, और उनकी आवाज़ में उस व्यक्ति की शांति थी जो नियति को देख रहा हो।
“जी, गुरुदेव। समझौता हुआ।”
“क्या हमारे बीच वचन हुआ?”
“जी, गुरुदेव। वचन हुआ।”
गुरु संतोष से मुस्कुराए।
“जेड का संदूक हमारे संकल्प का प्रतीक है। इसकी रक्षा अपने प्राणों की तरह करना: इसे खोलना मत, खोना मत, बेचना मत, और किसी को इसे छीनने मत देना।”
शिष्य ने आदर से संदूक थामे हुए सिर झुकाया।
“ऐसा ही करूँगा, गुरुदेव।”
“अपना लक्ष्य तय करो, उसी के लिए जियो, और ज़रूरत पड़े तो उसी के लिए मरो। और याद रखना: जब भी राह भटको, मुझे पुकारना। तुम्हारे क़दम तुम्हें जहाँ भी ले जाएँ, मैं तुम्हारे साथ रहूँगा।”
फिर गुरु ने कुछ ऐसा कहा जो किसी प्राचीन मुहर की तरह भारी और रहस्यमय लगा, और हवा ने अपनी दिशा बदल ली:
“अर्नाकाबे।”
शिष्य के शरीर में सिहरन दौड़ गई।
“अर्नाकाबे?”
“अपने सपनों को मार डालो,” गुरु ने गंभीर स्वर में दोहराया।
उसने पुआल की टोपी पहनी, उठा, और चाँदनी में नहाई पगडंडी से नीचे उतर गया। जेड का संदूक उसके खुरदुरे हाथों में धड़क रहा था। अब वह डर नहीं, संकल्प महसूस कर रहा था: एक शांत निश्चय कि उसकी ज़िंदगी बदल चुकी है।
“जल्द ही मैं स्वर्ण-भूमि में होऊँगा,” उसने सोचा। “और पहली बार, यह सिर्फ़ एक सपना नहीं होगा।”
अपने सपनों को मार डालो से, गुस्तावो लोरेंज़ोनी












